ताजमहल की शाही मस्जिद के सदर और सामाजिक कार्यकर्ता सैय्यद इब्राहिम हुसैन ज़ैदी बेबाकी के साथ कहते हैं कि इस्लाम में हिंसा और आतंक के लिये कोई जगह ही नही है तो फिर बेगुनाहों का कत्ल करने वाले मुसलमान कैसे हो सकते हैं? और जो मुसलमान है ही नही तो उसे दफनाने की बात तो दूर जनाज़े की नमाज़ पढाने का भी सवाल नही उठता। इस्लाम धर्म सिर्फ आपसी भाईचारे और प्यार का पैगाम देता है। यही इस मजहब की बुनियाद है।
ज़ैदी बताते हैं कि इस्लाम कहता है जो इसांन अपने मुल्क का वफादार नही वो मुसलमान हो ही नही सकता। हिन्दुस्तान के मुसलमान हमेशा इस तरह की हरकतों और हमलों के खिलाफ रहें हैं और रहेगें। उनके मुताबिक मुम्बई के उलेमाओं और इमामों का फैसला बिल्कुल सही है।
ग्यारहवीं के छात्र इमरान हुसैन का कहना है कि आतंक फैलाने वाले इस तरह के लोगों को अपने मुल्क की ज़मीन मे जगह ना दिये जाना एक ऐसा फैसला है जिस पर किसी भी मुसलमान को एतराज नही होगा। इमरान कहते हैं कि उन्हे जब इस तरह की घटनाऐं देखने और सुनने को मिलती हैं तो बड़ा अफसोस होता है। वो केवल देश मे अमन और शांति चाहते हैं।

