लखनऊ। बच्चों की यह कुछ अलग दुनिया है। यहां इन बच्चों की मासूम आंखें होली की रंगीनियां और दीपावली की चकाचौंध नहीं जानती। इनके लिये दशहरा, दीपावली और ईद बस किताबों के पन्नों में दर्ज हैं। त्यौहार के दिन इनके बाल गृह की चहारदीवारी के भीतर जो कुछ भी होता वही इनके लिये पर्व है। निराश्रित गृहों में रहने वाले बच्चों की दुनिया उनके आश्रम तक ही सिमटी हुई है। त्यौहारों पर नये कपड़े के लिये मचल उठना और मनपंसद पकवान के लिये जिद करना इन बच्चों को पता ही नहीं है।निराश्रित गृहों में रहने वाले बच्चों की दुनिया बस एक चहारदीवारी के भीतर ही सिमटी हुई है। यहीं इन बच्चों की सुबह शुरू होती है और यहीं शाम हो जाती है। त्यौहारों की मस्ती और धमाचौकड़ी का इनकी जिदंगी में कोई मायने नहीं है। इनका बाल मन बस इतना ही जानता है कि होली हो या दीवाली उन्हें खाने के लिये रोज से हटकर कुछ अलग पकवान मिलते हैं और इस दिन पढ़ाई भी नहीं करनी पड़ती। दीपावली के दिन पटाखे और खील-मिठाई मिल जाए इसके लिये इन बच्चों को प्रार्थना करनी पड़ती है। कोई दानदाता पटाखे और खिलौने दे गया तो ये भी उसका मजा ले लेते हैं। पिछली बार कुछ लोगों ने पटाखे और मिठाइयां दीं तो उनका भी पर्व उल्लास से भर गया। इस बार दशहरे में उन्हें निराशा ही हाथ लगी। कोई उनके उल्लास को बढ़ाने नहीं आया। दशहरे के दिन ये बच्चे अपने कमरे की खिड़की पर लटक कर मेले में जाते लोगों के हुजूम को देखकर स्वयं उसमें शामिल होने की कल्पना ही करते रह गये। अब बच्चों को दीवाली का इंतजार है। छह साल की कल्पना इस बार भी पटाखे और खिलौने मिलने की बाट जोह रही है। सात साल का गौरव कहता है कि ईद और दीपावली के दिन वह लोग आपस में मौजमस्ती कर लेते है लेकिन कभी बाहर घूमने नहीं जाते। बीते दिनों वाइल्ड लाइफ वीक के दौरान चिड़ियाघर प्रशासन की ओर से इन बच्चों को चिडि़याघर दिखाया गया। चिड़ियाघर घूमना इन बच्चों के लिये सपनों सरीखा था। इनमें से कुछ बच्चे ऐसे थे जिन्होंने महीनों बाद बालगृह की चौखट से बाहर कदम रखा था। उस सैर के हसीन सपने अभी भी इनके मन में तैर रहे है। वहीं राजकीय बाल गृह के अधीक्षक जयपाल वर्मा कहते हैं कि त्यौहारों के अवसर पर बच्चों के लिये विशेष प्रकार के खानपान की व्यवस्था ही जाती है लेकिन किसी प्रकार का अतिरिक्त बजट न होने के कारण इन बच्चों को घुमाने के लिये बाहर नहीं ले जाया जाता है।

